मेघ बीजन या बादल बीजन (Cloud Seeding)

 अर्थ

मेघ बीजन एक ऐसी वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें कृत्रिम रूप से वर्षा (बारिश) कराने के लिए बादलों में कुछ रासायनिक पदार्थ (जैसे सिल्वर आयोडाइड, सोडियम क्लोराइड या ड्राई आइस) छोड़े जाते हैं।




📰 क्यों है चर्चा में?

दिल्ली सरकार और IIT कानपुर ने 28 अक्टूबर 2025 को क्लाउड सीडिंग (कृत्रिम वर्षा) का प्रयोग किया, ताकि सर्दियों में बढ़ते वायु प्रदूषण को कम किया जा सके।
हालाँकि यह प्रयोग बारिश कराने में असफल रहा, लेकिन इसने वायु गुणवत्ता सुधारने की नई संभावनाओं पर चर्चा शुरू कर दी है।
यह भारत में 50 साल बाद किया गया पहला बड़ा क्लाउड सीडिंग ऑपरेशन था, इसलिए यह खबर सुर्खियों में है।

🤝 प्रमुख साझेदार संस्थान

  • दिल्ली सरकार – परियोजना की पहल और वित्तीय सहयोग

  • IIT कानपुर – वैज्ञानिक सहायता और तकनीकी मूल्यांकन

  • IMD (भारतीय मौसम विज्ञान विभाग) – मौसम की स्थिति और बादलों की पहचान

  • DGCA (नागरिक उड्डयन महानिदेशालय) – हवाई संचालन की अनुमति

📍 प्रयोग का उद्देश्य

सर्दियों के मौसम में दिल्ली की जहरीली स्मॉग (Smog) और बढ़ते PM2.5 व PM10 स्तर को कम करने के लिए कृत्रिम बारिश कराने की योजना बनाई गई थी।
सरकार का मानना था कि बारिश से हवा में मौजूद सूक्ष्म प्रदूषक कण नीचे बैठ जाएंगे और लोगों को कुछ राहत मिलेगी।


💰 लागत और संचालन

इस प्रोजेक्ट का कुल बजट करीब ₹3.21 करोड़ था।
हर एक विमान उड़ान (sortie) की औसत लागत लगभग ₹64 लाख आई।
दो हवाई उड़ानें बुराड़ीमयूर विहार और करोल बाग के ऊपर संचालित की गईं।


🌦️ परिणाम क्या रहा?

प्रयोग के दौरान कुछ जगहों पर हल्की नमी में बदलाव जरूर देखा गया, लेकिन वर्षा नहीं हुई।
IIT कानपुर की रिपोर्ट के अनुसार, उस दिन बादलों में नमी केवल 15–20% थी, जबकि सफल क्लाउड सीडिंग के लिए 50–60% नमी आवश्यक होती है।
फिर भी, प्रयोग के बाद कुछ सेंसरों में PM2.5 और PM10 स्तर में 6–10% की अस्थायी कमी दर्ज की गई।



☁️ क्लाउड सीडिंग कैसे काम करता है?

क्लाउड सीडिंग में विमान या रॉकेट के ज़रिए बादलों में Silver IodideSodium ChloridePotassium Iodide या Dry Ice जैसे रसायन छोड़े जाते हैं।
ये रसायन बादलों में मौजूद जलवाष्प को संघनित (condense) करने में मदद करते हैं, जिससे छोटे-छोटे कण बूंदों या बर्फ के क्रिस्टलों में बदल जाते हैं।
जब ये कण पर्याप्त भारी हो जाते हैं, तो वे वर्षा के रूप में नीचे गिरते हैं।



⚙️ क्लाउड सीडिंग की प्रक्रिया चरणबद्ध तरीके से

1️⃣ बादलों की पहचान – IMD ऐसे बादलों का चयन करता है जिनमें पर्याप्त नमी और ऊँचाई होती है।
2️⃣ रसायनों का चयन – बादलों के प्रकार के अनुसार उचित सीडिंग एजेंट चुना जाता है।
3️⃣ वितरण प्रक्रिया – विमान या ड्रोन के माध्यम से रसायन बादलों में छोड़े जाते हैं।
4️⃣ सूक्ष्म प्रतिक्रिया – जलवाष्प रासायनिक कणों पर जमा होकर बूंदें बनाता है।
5️⃣ मॉनिटरिंग और विश्लेषण – वर्षा और प्रदूषण स्तरों की तुलना की जाती है।


🔍 निष्कर्ष

हालाँकि यह प्रयास बारिश कराने में असफल रहा, लेकिन इससे दिल्ली के वातावरण, प्रदूषण स्तर और मौसम विज्ञान से जुड़ा काफी डेटा एकत्रित किया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगली बार जब बादलों में पर्याप्त नमी होगी, तो इस तकनीक से बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
IIT कानपुर और दिल्ली सरकार ने संकेत दिया है कि वे आने वाले महीनों में इस प्रयोग को दोबारा करने की योजना बना रहे हैं।



कोई टिप्पणी नहीं

Deejpilot के थीम चित्र. Blogger द्वारा संचालित.